आजकल हमारे सांसद लामबंद है एक ऐसे कार्टून को लेकर जो ६३साल पहले बना था और जिसे कार्टून के पितामह कहे जाने वाले श्री केशव शंकर पिल्ले ने बनाया था वो केशव शंकर जिन्हे भारत सरकार न जाने कितने सम्मानो से सम्मानित कर चुकी है| आज उन्ही के एक कार्टून को किताबो से हटवाने के लिए सारे सांसद पिछे पड़े है और तर्क ये दे रहे है की इसमे दलित भावनाओ को चोट पह्ोची है और बच्चो मे नेताओ के प्रति ग़लत संदेश जा रहा है|
मै भी उस कार्टून की तलाश मे कई दिनो से पत्र पत्रिकाओ के पन्ने तलाश रहा था आख़िरकार मिल गया वो कार्टून जिसमे दिखाने की कोशिश की गयी है की कैसे डा.अंबेडकर धीरे धीरे खिसक रहे संबिधान रूपी घोंघे पर बैठे चाबुक लगाकर उसे तेज़ चलाने का प्रयास कर रहे है और नेहरू जी भी पिछे खड़े हो यही कर रहे है| ध्यान से देखने पर पता चलता है की नेहरू जी चाबुक का वॉर अंबेडकर पर नही बल्कि घोंघे पर कर रहे है उनकी निगाहे नीचे की ओर घोंघे पर है|
मैने इसे कई बार देखा पर मुझे कही से भी ये नही लगा की इस कार्टून मे किसी भी तरह किसीका अपमान किया गया हो | ये तो उस व्यवस्था पर व्यंग करता है जब संबिधान बनाने मे हो रहे देरी से सब परेशान थे |
मैने ये कार्टून अपने पड़ोस के ८साल के बच्चे को दिखाकर मतलब पुछ लिया बच्चे ने कहा -“ये दोनो आदमी कछुये को हंटर मारके कह रहे है की तेज़ चलो”|
अब यहाँ सोचने को मजबूर करने वाली बात ये है की क्या हमारे सांसदो की बौद्धिक क्षमता एक ८ साल के बच्चे से कम है, या ये आदती हो गये है सामान्य से अविवादित मुद्दे को विवादित करके संसद का कीमती समय नष्ट करने के?
जहाँ देश की जनता महगाई, भ्रष्टाचार जैसी चीज़ो से त्रस्त है, जहाँ युवा बेरोज़गार घूम रहे है, देश की आर्थिक हालत मंदी की ओर इशारा कर रही है और पूरे देश की निगाहे संसद की ओर कुछ भले की उम्मीद से टकटकी लगाए हुई हो ऐसे मौके पे हमारे माननीय मंत्री, सांसद एक सामान्य से कार्टून के पिछे आपस मे लड़ के खुद का कार्टून बनवा रहे है, और ये तर्क दे रहे है की इस कार्टून से लोकतंत्र की छवि खराब हो रही है?
जब यही सांसद लोकसभा, विधानसभा मे कुर्सिया, चप्पल, माइक्रोफ़ोन फेकते नज़र आते है, अश्लील वीडीओ देखते पकड़े जाते है तब लोकतंत्र की छवि का ख्याल नही आता?
क्या भाजपा, क्या कांग्रेस, क्या सपा, क्या बसपा सभी एक स्वर मे इसका विरोध कर रहे और कहते है की लोकतंत्र के मुद्दे पर हम सभी एक है|
ये एकता तब क्यू नही दिखती जब पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत क़ानून बनाने की माँग कर रहा है, या सुरसा के मुह की तरह बढ़ती जा रही महँगाई को रोकने की गुहार करता है?
चलिए अगर इस कार्टून को हटा भी दिया जाय तो क्या हमारे माननीय सांसद लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखने का भरोसा जनता को दिलाएँगे? क्या सिर्फ़ एक कार्टून के हटने से देश के लोकतंत्र की बिगड़ी हुई छवि(जैसा की कहा जा रहा है) सुधर जाएगी?
आज इन्हे कार्टूनो से परेशानी है तो उन्हे हटा रहे है कल फसेबुक, ट्वियर जैसे सोसल साइट पर प्रतिबंध लगाएंगे कहेंगे की इसमे जनता नेताओ के खिलाफ अपनी भाड़ास निकलती है जिससे लोकतंत्र की छवि खराब हो रही है|
तो क्या हम ये माने की हमारी संसद एक तानाशाही प्रवृति की ओर बढ़ रही है?
या ये माने की अब हमारे यहाँ ग़रीबी, महगाई, बेरोज़गारी जैसे मुद्दो का विशेष महत्व नही रह गया इसलिए सामान्य से मुद्दे को असामान्य बना उसपर राजनीति की जा रही है?
या फिर ये की ये सब गहरी समस्यावो से जनता का ध्यान बटाने का तरीका है?
